वह जन्म से पहले ही माँ थी
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एक बच्ची जब माँ की कोख में पल रही होती है, उसी समय उसके सूक्ष्म शरीर में भविष्य की कोख का निर्माण भी अनवरत प्रगतिशील होता है अर्थात, जब वह स्वयं दुनिया में नहीं आई होती, उसने स्वयं दुनिया नहीं देखी होती उससे भी पहले उसके भीतर आने वाली पीढ़ियों की शुरुआत का इतिहास पनप चुका होता है। प्रकृति उसे बहुत पहले से ही पालनहार बना देती है — जन्म से पहले ही। यह सिर्फ विज्ञान नहीं, अत्यंत विस्मृत करने वाला भाव है, जिसे मातृ रूपी भावना के साथ स्पंदित किया जा सकता है।
भारतीय समाज में मातृत्व का यह भाव मात्र किताबों या प्रयोगशालाओं में नहीं दिखता अपितु यह रसोईघर की ऊर्जा में दिखता है, जहाँ गैस पर चढ़ी कढ़ाई से जीरे और हींग की खुशबू उठती है और कोई स्त्री घंटों खड़ी रहकर सबके लिए खाना बनाती रहती है। यह उन हाथों में दिखता है जो बार‑बार रोटी सेकते हैं, सब्जी परोसते हैं, ताकि घर में कोई भूखा न रह जाए और इन सबके बीच उन्हे स्वयं की भूख की चिंता ही नहीं रहती क्योंकि वे वास्तव मे अन्नपूर्णा होती है ।
हमारे घरों में यह रीत इतनी पुरानी है कि हमे यह बात सामान्य सी लगती है। सामान्यतया पुरुष और बच्चे भोजन के लिए पहले बैठते हैं । उनके लिए गरमा गरम थाली सामने आ जाती है, सब कुछ उनकी पसंद का; और उधर माँ, पत्नी, बहू, बेटी सब मिलकर यही देखते रहते हैं कि किसी की थाली में कुछ छूट न जाए। बाहर की दुनिया भले ही इसे दासता या अन्य किसी नकारात्मक संज्ञा की उपमा दे किन्तु बहुसंख्यक स्त्रियों के लिए यह सेवा ही उनका सबसे बड़ा प्रेम‑भाव होता है, जिसे किसी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं होती वरन भोजन के प्रति प्रेम से कहे दो शब्द ही उनके इस प्रयास के लिए संजीवनी का कार्य कर जाते है
कई बार यह निःशब्द प्रेम अपने चरम पर दिखाई देता है जब पति बस यूँ ही कह देता है – “आज ये खास व्यंजन खाने का मन कर रहा है”, और शायद उसे बनाने में घंटों लगते हैं और उसकी सामग्री भी आसानी से नहीं मिलती। वह स्त्री चुपचाप सुन लेती है, याद रखती है, और अगले दिन या उसी शाम वही व्यंजन गरमागरम उसकी थाली में परोस दिया जाता है। कई बार उस पुरुष को इसका ज्ञान ही नहीं होता कि थाली मे परोसा गया भोजन ही मात्र शेष है और उस दिन उस घर में यह व्यंजन मात्र उतना ही बन पाया है । वहीं रसोई में खड़ी माँ, बहन या बेटी ने सबके लिए बनाने का प्रयत्न किया तो था किन्तु स्वयं के लिए एक चम्मच भी अलग से बचा कर रखने का साहस नहीं किया क्योंकि यह उन्हे न्यायोचित नहीं लगा इसलिए उन्होंने उसे नहीं रखा। बावजूद इसके उनके चेहरे पर ना शिकायत होती है, ना ही कोई इच्छा होती — सिर्फ यह सुकून का भाव रहता है कि उनका (पिता, पुत्र, दामाद, ससुर, भाई, देवर) पेट भर गया और उनकी तृप्ति के भाव से अप्रत्यक्ष रूप सेउनकी क्षुधा भी शांत हो जाती है ।
यह भारतीय नारी की उस निःशब्द वीरता की पराकाष्ठा है, जो किसी खबर के रूप मे सुर्खी नहीं बनती । वह तालियाँ नहीं माँगती, धन्यवाद नहीं मांगती, बस दीपक की तरह प्रदीप्त रहती है — खुद पिघलकर, दूसरों के लिए रोशनी और ऊष्मा देती रहती है। दुनिया माँ को अक्सर सिर्फ उस बच्चे से मापती है जिसे वह जन्म देती है, लेकिन हमारे समाज में सदियों से समझा गया है कि स्त्री का मातृत्व उसके प्रेम की गहराई में बसता है। यह प्रेम उसके जन्म से भी पहले जन्म ले चुका होता है, उसकी रग‑रग में, उसके अस्तित्व की बनावट में ।
वह कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी। वह हमेशा से, पहले दिन से ही, एक माँ होती है
